आज से करीब तीन अरब साल पहले अगर आप अंतरिक्ष से धरती को देखते तो मौजूदा भारत के उत्तरी किनारे पर एक लंबी, धुंधली-सी लेकिन सख्त चट्टानी रेखा दिखाई देती। न हिमालय, न बहती गंगा और न कोई रेगिस्तान बस एक अकेली पर्वतमाला- अरावली ही नजर आती। आज वही अरावली जो पृथ्वी के इतिहास से भी पुरानी है, उस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के अरावली पहाड़ी को लेकर 20 नवंबर को सुनाए गए फैसले के बाद सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ‘सेव अरावली’ की मुहिम ने जोर पकड़ लिया है। गुरुग्राम से शुरू हुए प्रदर्शन जो जल्द दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान और हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में विरोध की आवाज बन गए।
पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों में गहरी चिंता पसर गई। सवाल सिर्फ पहाड़ियों का नहीं, बल्कि पानी, हवा, जलवायु, जैव विविधता और करोड़ों लोगों के जीवन का खड़ा हो गया।
विपक्ष के नेताओं ने भी विरोध किया तो सरकार ने सामने आकर अपना पक्ष भी रखा। अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की वैकेशन बेंच आज यानी सोमवार को सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपने पुराने फैसले पर रोक लगाते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। बेंच में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल रहे।
अरावली क्या है?
अरावली क्या है, यह समझने के लिए हमें स्कूल वाली भूगोल की किताबों से बाहर निकलना होगा। यह दुनिया की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन रेंजों में से एक है। इसका निर्माण करीब तीन अरब साल पहले तब हुआ, जब पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेटें आपस में टकरा रही थीं और जीवन समुद्र से बाहर आने की प्रक्रिया में था।
प्लेट टेक्टॉनिक्स के शुरुआती दौर में प्लेटों की टक्कर और आंशिक सबडक्शन से भारी दबाव और ताप पैदा हुआ, जिससे चट्टानें मुड़ीं, उठीं और इस तरह अरावली की पहाड़ियां बनीं। यह पर्वतमाला करीब 692 किलोमीटर लंबी है। इसे तीन हिस्सों- जरगा रेंज, हर्षनाथ रेंज और दिल्ली रेंज में बांटा गया है।
अरावली की एवरेज ऊंचाई 400 से 600 मीटर के बीच है। सबसे ऊंची चोटी राजस्थान के माउंट आबू में है गुरु शिखर, जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है। यह चार राज्यों- गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली से होकर गुजरती है। इसका करीब 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है।
उत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते लाखों वर्षों के कटाव के कारण पहाड़ियां नीची होती जाती हैं। दिल्ली पहुंचते-पहुंचते अरावली की ऊंचाई कम होते-होते लगभग मैदान में तब्दील हो जाती है। यही वह जगह है, जहां से अरावली की वैज्ञानिक पहचान और सरकारी परिभाषा के बीच टकराव शुरू होता है।
पर्वतमाला का नाम अरावली क्यों?
अरावली शब्द संस्कृत के ‘अर्बुदावलि’ से बना है। इसे राजस्थान में ‘आडावळ’ नाम से भी जाना जाता है।
दिल्ली में अरावली देखनी हो कहां जाएं?
दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी अरावली की पहाड़ियों पर बसी है। राष्ट्रपति भवन – जिसे रायसीना हिल्स भी कहा जाता है, इसी पर्वतमाला की अलग-अलग पहाड़ियों पर बना है। दिल्ली रेंज से बनास, साबरमती और साहिबी जैसी नदिया भी निकलती हैं।
इतना ही नहीं,ये पहाड़ियां थार रेगिस्तान से आने वाली गर्म हवा और उत्तरी भारत को मरुस्थल बनने से रोकती हैं। गंगा, यमुना के मैदानों को रेगिस्तान बनने से बचाती है।
अरावली कई दुर्लभ जीवों का ठिकाना भी है जैसे- तेंदुआ, लोमड़ी, नीलगाय और मोर। टाइगर रिजर्व और रणथंबोर नेशनल पार्क भी इसी रेंज में आते हैं।
प्राचीन इतिहास में यहां पांचवी सदी से खनन होता था। तांबे के औजार बनाए जाते थे, लेकिन समय बीतने के साथ समस्या बढ़ती गई। खासकर 1960-70 के दशक में जब विकास के नाम पर अवैध खनन बढ़ा।
अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला है। यह बात आपने ऊपर खबर में पढ़ ली है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केवल अरावली ही नहीं, बल्कि भारत में ऐसी कई पर्वतमालाएं है, जिनका इतिहास सदियों पुराना है।
अगर नहीं जानते हैं तो कोई बात नहीं, चलिए हम आपको बताते हैं- अरावली की तरह भारत के अन्य पुराने पहाड़ों के बारे में..
पूर्वी घाट: 80 करोड़ साल पुराना
पूर्वी घाट का इतिहास लगभग 800 मिलियन यानी 80 करोड़ या 8000 लाख साल पुराना है। पूर्वी घाट भारत के दक्षिण-पूर्वी भाग में हिंद महासागर के तट पर मौजूद है।
इसकी श्रृंखला ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना राज्यों से होकर गुजरती है। पूर्वी घाट का सबसे ऊंचा पहाड़ ‘अरमा कोंडा’ है। इसके साथ ही यह 75,000 वर्ग किलोमीटर तक फैली हुई है।
विंध्य पर्वत: 6500 लाख साल पुराना
विंध्य शब्द संस्कृत के शब्द ‘विन्ध्य’ से बना है, जिसका अर्थ है रास्ते में पड़ना। विंध्य पर्वत लगभग 650 मिलियन यानी 6500 लाख साल पुराना है। यह मध्य प्रदेश से वाराणसी (बनारस) की गंगा नदी घाटी से होकर गुजरती है। इसके साथ ही विंध्य पर्वत से गंगा-यमुना दक्षिणी सहायक नदिया निकलती हैं। इनमें चंबल, बेतवा, केन और टोन्स शामिल हैं। ये पहाड़िया आकार में छोटी हैं।
सतपुड़ा पहाड़: 6,000 लाख साल पहले बना
भारत में स्थित सतपुड़ा पहाड़ लगभग 600 मिलियन साल पुराना है। यह पूर्वी गुजरात से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ में जाकर खत्म होती है। यह पहाड़ियां लगभग 900 किलोमीटर तक फैली हुई है।
इसके अलावा, सतपुड़ा पहाड़ शिस्ट, ग्रेनाइट और क्वार्टजाइट से बनी है। सतपुड़ा पहाड़ की चोटियां पठार आकृति की तरह दिखाई देती है। इसमें दक्षिण की ओर स्थित पहाड़ की श्रेणियों में ढ़लान ज्यादा और उत्तर की ओर स्थित सतपुड़ा की श्रेणियों में ढलान कम होती है।
महेंद्रगिरी पहाड़: 1,501 मीटर ऊंंचाई है
महेंद्रगिरी पहाड़ का इतिहास भी काफी ज्यादा पुराना है। महेंद्रगिरी पहाड़ का वर्णन पौराणिक कथाओं जैसे रामायण और महाभारत में भी मिलता है। इस पहाड़ की ऊंचाई 1,501 मीटर है।
यह पहाड़ ओडिशा और आंध्र प्रदेश में स्थित हैं। महेंद्रगिरी ओडिशा की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। साथ ही यहां 600 से अधिक पुष्पीय पौधे और औषधीय जड़ी-बूटियां मिलती है। इसके साथ ही साल 25 नवंबर‚ 2022 को ओडिशा सरकार ने महेंद्रगिरि पहाड़ी को जैव विविधता विरासत घोषित किया था।