हल्द्वानी। उत्तर भारत के पक्षी प्रेमियों के लिए खुशखबरी है। अगर वे ब्लैक बाजा पक्षी का दीदार करना चाहते हैं तो उत्तराखंड के नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में आ सकते हैं। पूर्वोत्तर भारत, पश्चिमी घाट और मध्य पश्चिम हिमालय में नजर आने वाला यह पक्षी पहली बार उत्तराखंड में नजर आया है, जिससे पक्षी प्रेमी बेहद उत्साहित हैं।
हल्द्वानी डिवीजन की ओर से नंधौर वाइल्डलाइफ सेंचुरी में 19 से 21 दिसंबर के बीच पक्षी गणना 2025 कराई गई थी। इसमें पक्षियों की प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। जहां 2023 की पक्षी गणना में 168 पक्षी नजर आए थे, वहीं इनकी संख्या बढ़कर 215 हो गई है। खास बात यह है कि यहां दुर्लभ, अत्यंत संकटग्रस्त, संकटग्रस्त प्रजातियों के पक्षी दिखे।
डीएफओ कुंदन कुमार ने बताया कि पक्षी गणना में न सिर्फ शीतकालीन प्रवासी और ऊंचाई प्रवासी पक्षियों की अधिक उपस्थिति देखने को मिली है, बल्कि शिकारी पक्षियों की विविधता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वहीं, ब्लैक बाजा का हल्द्वानी डिवीजन में दिखना इसका पश्चिम दिशा में एक महत्वपूर्ण विस्तार का संकेत देता है।
वन कर्मियों, प्रशिक्षित नेचर गाइड्स और विशेषज्ञों की टीम ने प्वाइंट काउंट और लाइन ट्रांसेक्ट मानक वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल करते हुए नम साल वन, मिश्रित पर्णपाती वन, नदी तटीय क्षेत्र, आर्द्रभूमियों और घास के मैदान में सर्वे किया। इस दौरान सुबह-शाम पक्षियों की अधिक सक्रियता दिखी।
उत्तराखंड में सिर्फ नंधौर में मिलता है रेड-हेडेड ट्रोगन पक्षी
पक्षी गणना में रेड-हेडेड ट्रोगन भी दिखा है, जो उत्तराखंड में सिर्फ नंधौर में पाई जाती है। यह प्रजाति पूर्वी हिमालयी पक्षी समूह का एक प्रमुख प्रतिनिधि है। इसकी उपस्थिति उच्च गुणवत्ता वाले आवास, जटिल वन संरचना और उपयुक्त सूक्ष्म-आवासों की निरंतरता को दर्शाती है, जो इस प्रजाति के पश्चिमी विस्तार क्षेत्र में अत्यंत दुर्लभ हैं।
ये महत्वपूर्ण पक्षी प्रजातियां भी दिखीं
- अत्यंत संकटग्रस्त: व्हाइट-रम्प्ड ईगल
- संकटग्रस्त: स्टेपी ईगल, पैलस फिश ईगल
- असुरक्षित: ग्रेट हार्नबिल, ग्रेट स्लेटी वुडपेकर
- निकट संकटग्रस्त: हिमालयन ग्रिफन, सिनेरीयस गिद्ध, रूफस-बेलिड ईगल, लेसर फिश ईगल
ब्लैक बाजा पक्षी का नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में दिखना
ब्लैक बाजा पक्षी का नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में दिखना दुर्लभ है। इस पक्षी का बसेरा पूर्वी हिमालय और पूर्वोत्तर भारत में है और उत्तराखंड में नंधौर पूर्व का क्षेत्र है, इसलिए इसके यहां पहुंचने की संभावित वजह हो सकती है।
–– धनंजय मोहन, पक्षी विशेषज्ञ